Sunday

मुंशी प्रेमचंद की जयंती

                            

                         प्रेमचंद का जीवन परिचय

प्रेमचंद का नाम असली नाम धनपत राय था. उनका जन्म 31 जुलाई, 1880 को बनारस के लमही नामक गांव में हुआ था।इन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की सजा भी भोगी, लेकिन पीछे नहीं हटे।अपने मित्र मुंशी दयानारायण निगम के कहने पर उन्होंने अपना नाम धनपतराय की जगह प्रेमचंद रख लिया। इनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल था, जो डाकघर में मुंशी का पद संभालते थे।
प्रेमचंद जब 6 वर्ष के थे, तब उन्हें लालगंज गांव में रहने वाले एक मौलवी के घर फारसी और उर्दू पढ़ने के लिए भेजा गया।वह जब बहुत ही छोटे थे, बिमारी के कारण इनकी मां का देहांत हो गया।उन्हें प्यार अपनी बड़ी बहन से मिला,बहन के विवाह के बाद वह अकेले हो गए, सूने घर में उन्होंने खुद को कहानियां पढ़ने में व्यस्त कर लिया।आगे चलकर वह स्वयं कहानियां लिखने लगे और महान कथाकार बने।इनका विवाह 15-16 वर्ष में ही कर दिया गया था, लेकिन ये विवाह उनको फला नहीं और कुछ समय बाद ही उनकी पत्नी का देहांत हो गया।कुछ समय बाद उन्होंने बनारस बाद चुनार के स्कूल में शिक्षक की नौकरी की, साथ ही बीए की पढ़ाई भी करते रहे बाद में उन्होंने एक बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया, जिन्होंने प्रेमचंद की जीवनी लिखी जिसको हम "प्रेमचंद घर में के नाम से पढ़ते है। "प्रेमचंद्र ने लगभग 300 कहानियां तथा चौदह बड़े उपन्यास लिखे।8 अक्टूबर 1936 को 56 वर्ष की उम्र में लंबी बिमारी के कारण उनका निधन हो गया।उनके रचे साहित्य का अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं में भी हुआ है।
हिंदी साहित्य के सबसे लोकप्रिय लेखक प्रेमचंद ने हिंदी में कहानी और उपन्यास को सुदृढ़ नींव प्रदान की और यथार्थवादी चित्रण से देशवासियों का दिल जीत लिया।यही कारण है कि हिंदी साहित्य के इतिहास में हिंदी कहानी और हिंदी उपन्यास के समय का निर्धारण प्रेमचंद के नाम के आधार पर किया गया है,जिसको प्रेमचंद पूर्व हिंदी उपन्यास प्रेमचंद युगीन,और प्रेमचंद के बाद हिंदी उपन्यास के नाम से जाना जाता है।ये इनके साहित्य में योगदान को दर्शाता है।
हिन्दी कथा-साहित्य को तिलस्मी कहानियों के झुरमुट से निकालकर जीवन के यथार्थ की ओर मोड़कर ले जाने वाले कथाकार मुंशी प्रेमचंद देश ही नहीं, दुनिया में विख्यात हुए और 'कथा सम्राट' कहलाए।उन्‍होंने आमजन की पीड़ा को शब्दों में पिरोया, यही वजह है कि उनकी हर रचना कालजयी है और इनको यथार्थवादी रचनाकार के नाम से जाना जाता है।

पहली कहानी संग्रह को अंग्रेजी हुकूमत ने जला दिया
प्रेमचंद की पांच कहानियों का संग्रह 'सोज़े वतन' 1907 में प्रकाशित हुआ।सोज़े वतन, यानि देश का दर्द, प्रेमचंद की उर्दू कहानियों का यह पहला संग्रह था जो उन्होंने ‘नवाब राय’ के नाम से छपवाया था।अंग्रेजी हुक्मरानों को इन कहानियों में बगावत की गूंज सुनाई दी। हम्मीरपुर के कलक्टर ने प्रेमचंद को बुलवाकर उनसे इन कहानियों के बारे में पूछताछ की, प्रेमचंद ने अपना जुर्म कबूल किया,उन्हें कड़ी चेतावनी दी गयी और सोजे वतन की 500 प्रतियां जो अंग्रेजी हुकूमत के अफसरों ने जगह-जगह से जप्त की थीं। उनको सरे आम जलाने का हुक्म दिया गया हालांकि सोजे वतन में शामिल सभी पांच कहानियाँ उर्दू मासिक ‘जमाना’ में पहले ही छप चुकी थीं।
इसके बाद भी प्रेमचंद ने खूब लिखा. लगभग तीन सौ कहानियां और लगभग आधा दर्जन प्रमुख उपन्यास, साथ ही एक नाटक भी।उर्दू में भी लिखा और हिन्दी में भी,उनके विषय किसान, मजदूर, पत्रकारिता, पूंजीवाद, गांधीवाद, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन, बेमेल विवाह, धार्मिक पाखंड, नारीवाद आदि रहे।
       प्रेमचंद राष्ट्रवाद को एक कोढ़ मानते थे
               आज पूरे देश में राष्ट्रवाद पर खूब चर्चा होती है।हर कोई इसकी परिभाषा अपने हिसाब से तय करता है, लेकिन प्रेमचंद के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ आज के राष्ट्रवाद की तरह संकीर्ण नहीं बल्कि बहुत व्यापक थी।हालांकि वो अन्तर्राष्ट्रीयता में विश्वास रखते थे,उनका मानना था कि जैसे मध्यकालीन समाज का कोढ़ सांप्रदायिकता थी, वैसे ही वर्तमान समय का कोढ़ राष्ट्रवाद है।प्रेमचंद का मानना था कि जैसे सांप्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर राज्य स्थापित कर देना चाहती थी और उसे उस बनाए घेरे से बाहर की चीजों को मिटाने में ज़रा भी संकोच नहीं होता था ठीक उसी तरह राष्ट्रीयता भी है जो अपने परिमित क्षेत्र के अंदर रामराज्य का आयोजन करती है।उसे लगता है कि उस क्षेत्र से बाहर का समाज उसका शत्रु है।प्रेमचंद अन्तर्राष्ट्रीयता के प्रचार पर जोर देते थे और उनका मानना था कि एक जागरूक समाज संसार में यही करता है। इतना ही नहीं प्रेमचंद का मानना था कि राष्ट्रवाद पुंजिवाद को जन्म देता है और फिर धर्म और जाति के हथियारों से उसकी रक्षा करता है. प्रेमचंद हमेशा पुंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ रहे. उन्होंने 6 नवम्बर 1933 के ‘जागरण’ में लिखा -"जिधर देखिए उधर पूंजीपतियों की घुड़दौड़ मची हुई है।किसानों की खेती उजड़ जाय, उनकी बला से,कहावत के उस मूर्ख की भाँति जो उसी डाल को काट रहा था, जिस पर वह बैठा था"।प्रेमचंद के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ काफी अलग था।उनके देश की परिभाषा में समानता की बात थी। स्त्री-पुरुष के बीच समानता, किसान-ज़मीदार के बीच समानता, विभिन्न धर्म और जातियों के बीच समानता, देश के नागरिकों के बीच आर्थिक समानता आदि ही उनके लिए एक असल राष्ट्र का सही अर्थ था।
जो भोगा वही लिखा-यथार्थवादी प्रेमचंद
प्रेमचंद ने जो भोगा, जो देखा वही लिखा. मुंशी प्रेमचंद की कल्पनाओं में चांद या मौसम का जिक्र नहीं बल्कि उनके साहित्य में हमेशा ही समाज के स्याह पक्ष का जिक्र मिलता है. उदाहरण के तौर पर 'गोदान' के होरी में किसान की दुर्दशा का जिक्र तो 'ठाकुर का कुंआ' में समाजिक हक से महरूम लोगों का दर्द। उनकी कोई भी कहानी या उपन्यास उठा कर देख लीजिए।आपको ऐहसास होगा कि उन्होंने कभी कलमकार बनकर नहीं बल्कि कलम के मजदूर बनकर लिखा।
मैं धनी नहीं मजदूर आदमी हूं'
"हंस" पत्रिका निकालने के पूर्व जयशंकर प्रसाद को लिखे एक पत्र में प्रेमचंद जी लिखते हैं कि- काशी से कोई साहित्यिक पत्रिका न निकलती थी। मैं धनी नहीं मजदूर आदमी हूं, मैंने 'हंस' निकालने का निश्चय कर लिया है। इस निश्चय के साथ मार्च 1930 में बसन्त पंचमी के दिन 'हंस' के प्रकाशन की शुरुआत हुई। हंस' नामकरण के बारे में कमल किशोर गोयनका कहते है कि-यह नाम उनके मित्र एवं प्रख्यात कवि जयशंकर प्रसाद ने छह माह पूर्व सुझाया था।इस पत्रिका का प्रकाशन भी उन्हीं के सरस्वती प्रेस से हुआ। 'हंस' के प्रथम अंक के संपादकीय लिखते हुए प्रेमचंद ने लिखा है- हंस भी अपनी नन्हीं चोंच में चुटकी भर मिट्टी लिये हुए समुद्र पाटने, आजादी की जंग में योगदान देने चला है।साहित्य और समाज में वह उन गुणों का परिचय करा ही देगा, जो परंपरा ने उसे प्रदान किया है।
एक युगद्रष्टा पत्रकार भी
प्रेमचंद एक युगद्रष्टा साहित्यकार ही नहीं, एक युगद्रष्टा पत्रकार भी थे। अपने पत्रों लेखों और टिप्पणीयां वे मानो आज की सच्चाई बयां करते लगते है। सन् 1905 में 'जमाना' में स्वदेशी चीजों का प्रचार कैसे बढ़ सकता है- विषय पर एक गंभीर टिप्पणी लिखते हुए मुंशी प्रेमचंद कहते है कि- स्वदेशी का अलख जगाने वाले और समाजवाद को ओढ़ने-बिछाने वाले बराबर दूरी पर खड़े हैं।



Saturday

मीराबाई और उनके पद

                                  

                         मीराबाई का जीवन परिचय   

मीराबाई, जिन्हें मीरा बाई या मीरा के नाम से भी जाना जाता है, ये 16वीं शताब्दी की प्रसिद्ध भारतीय कवयित्री, संत और श्री कृष्ण जी की भक्त थी। उनका जन्म सन् 1498 ई. के लगभग भारत के वर्तमान राजस्थान में मेड़ता के पास एक गांव चौकड़ी (कुड़की) में एक राजपूत शाही परिवार में हुआ था, उनके पिता का नाम रत्नसिंह राठौड़ और माता का नाम वीर कुमारी था। तथा ये जोधपुर के संस्थापक राव जोधा की प्रपौत्री थी।

मीरा दादी मां की कृष्ण भक्ति को देखकर प्रभावित हुई। एक दिन जब एक बारात दूल्हे सहित जा रही थी तब बालिका मीरा ने उस दूल्हे को देखकर अपनी दादी से अपने दूल्हे के बारे में पूछने लगी। तो दादी ने तुरंत ही गिरधर गोपाल का नाम बता दिया और उसी दिन से मीरा ने गिरधर गोपाल को अपना वर मान लिया।

साहित्यिक परिचय –

इनके काव्य रचना में इनका कृष्ण भक्ति प्रेम इनके हृदय की सरलता तथा निश्चलता का स्पष्ट रूप मिलता है, भक्ति-भजन ही इनकी काव्य रचना है, इनकी प्रत्येक पंक्ति सच्चे प्रेम से परिपूर्ण है, इनकी इसी प्रेमपूर्ण शैली की वजह से लोग आज भी इनकी पंक्तिया उतनी ही तन्मयता से गाते है !

                                    पद             

                 मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरे न कोई

               जा के सिर मोर -मुकुट मेरो पति सोई

              छाड़ी दयी कुल की कानि,कहा करिहै कोई?

              संतन ढिग बैठि-बैठि,लोक लाज खोयी

             अंसुवन जल सीचि- सीचि, प्रेम बोलि बोयी

             अब त बेलि फैलि गयी , आनंद -फल होयी 

              दूध की मथनियां बड़े प्रेम से बिलोयी

              दधि मथि घृत काढि लियो, डारि दयी छोयी 

              भगत देखी राजीव हुई ,जगत देखि रोई 

              दासी मीरा लाल गिरधर! तारों अब मोही ।

प्रसंग-

भावार्थ पंक्तियां कवित्री मीरा के द्वारा रचित है जो पद नरोत्तम दास स्वामी द्वारा संकलित मेरा मुक्तावली से लिया गया है इन पंक्तियों के माध्यम से कवित्री मीरा मोर मुकुट धारण किए हुए श्री कृष्ण को अपना पति मानते हुए कहते हैं कि उनके सिवा इस जगत में मेरा कोई दूसरा नहीं

व्याख्या-

इस दोहे में मीरा बाई श्री कृष्ण को अपना पति कह रही हैं और कहती हैं – मेरे तो बस श्री कृष्ण हैं जिसने पर्वत को ऊँगली पर उठाकर गिरधर नाम पाया। उसके अलावा मैं किसी को अपना नहीं मानती। जिसके सिर पर मौर का पंख का मुकुट हैं वही हैं मेरे पति।उनके सिवा इस जगत में मेरा कोई दूसरा नहीं आगे कवित्री कहती है कि मैंने कुल की मर्यादा का भी ध्यान छोड़ दिया है तथा संतो के साथ उठते बैठते लोक - लज्जा सब कुछ त्याग कर स्वयं को कृष्ण भक्ति में लीन कर लिया है कवित्री मीरा कहती हैं कि कृष्ण के प्रेम रूपी बेल को सीखने के लिए मैंने अपने आंसुओं को निस्वार्थ भाव से न्योछावर किया है। फलस्वरूप जिस बेल के बढ़ने से आनंद रूप फल की प्राप्ति हुई है आगे कवित्री एक दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए कहते हैं। कि जिस प्रकार दूध में मथानी डालकर दही से मक्खन निकाला जाता है और सिर्फ छाछ को पृथक कर दिया जाता है। ठीक उसी तरह मीरा ने भी संसारिकता के ढकोसलेपन से स्वयं को दूर रखा है और अपनी सच्ची और आत्मिक भक्ति से श्री कृष्ण के प्रेम को प्राप्त किया है आगे कवित्री मीरा कहती है कि जब मैं भक्तों को देखती हूं तो मुझे प्रसन्नता होती है और उन लोगों को देखकर मुझे दुख होता है जो संसार एकता के जाल में फंसे हुए हैं मीरा खुद को श्री कृष्ण की दासी मानती है और श्री कृष्ण से स्वयं का उद्धार करने की कामना करती है।


                          2.पद


पग घुंघरू बांध मीरा नाची,

मैं तो मेरे नारायण सू , अपाहिज हो गई सांची,

लोग कहे मीरा बाई बावरी: न्यात कहै कूल - नासी ,

विष का प्याला राणा भेज्या , पीवत मीरा हांसी ,

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, सहज मिले अविनासी


प्रसंग-

प्रस्तुत पंक्तियां कवियत्री मीरा के द्वारा रचित है जो पद नरोत्तम दास स्वामी द्वारा संकलित मेरा मुक्तावली से लिया गया है इन पंक्तियों के माध्यम से कवित्री मीरा करती है कि वह श्री कृष्ण के प्रेम में दीवानी हो गई है।

व्याख्या-

इन पक्तियों के माध्यम से कवित्री मीरा करती है कि वह श्री कृष्ण के प्रेम में दीवानी हो गई है तथा पैरों में घुंघरू बांधकर नाचने में मग्न है कवित्री मीरा श्री कृष्ण के प्रेम में इतना रस विभोर हो गई है कि लोग उसे पागल की संज्ञा देने लगे हैं उनके संगे संबंधी कहते हैं कि ऐसा करके वह कुल का नाम खराब कर रही है आगे कवित्री मीरा कहती है कि राणा जी ने उसे मारने के लिए विष का प्याला भेजा था, जिसे वह हंसते-हंसते पीली और अमृत को प्राप्त हुए। आगे कवित्री कहती है कि यदि प्रभु की भक्ति सच्चे मन से की जाए तो वह सहजता से प्राप्त हो जाती है। ईश्वर को अविनाश जी की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि वह नच्श्रर है।



 

Tuesday

कबीरदास और उनके पद

 

कबीर का जीवन परिचय-
कबीरदास जी का जन्म 1398 ई. में काशी में हुआ। एक किंवदन्ती के अनुसार कबीर का जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था। लोकलाज के भय से वह स्त्री इन्हें वाराणसी के लहरतारा नामक स्थान पर एक तालाब के पास छोड़ आयी। वहाँ से नीरू व नीमा नामक एक मुस्लिम जुलाहा दम्पत्ति ने इन्हें उठा लिया और इनका पालनपोषण किया। इनका बचपन मगहर में बीता। इन्हें शिक्षा प्राप्ति का अवसर नहीं मिला। यह सत्य है कि इन्होने अपनी रचनाओं को स्वयं लिपिबद्ध नहीं किया। बाद में ये काशी में जाकर बस गए। इनका विवाह लोई नामक स्त्री से हुआ। जिससे इनकी कमाल और कमाली नामक दो संतान उत्पन्न हुईं। जीवन के अंतिम दिनों ये बापस मगहर में आकर रहने लगे। इनकी मृत्यु के संदर्भ में विद्वानों में मतभेद है। अधिकांश विद्वानों के अनुसार कबीर दास की मृत्यु 1518 ई. में मगहर में हुई।
धार्मिक आडम्बरों के प्रबल विरोधी होने के बाद भी इनकी मृत्यु के बाद दोनों धर्मों के लोग इनके मृत शरीर का अपने धर्मानुसार संस्कार करना चाहते थे। हिन्दू इनका अंतिम संस्कार चिता पर दाह कर्म द्वारा करना चाहते थे। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम लोग इन्हें इस्लामिक परम्परानुसार दफनाना चाहते थे।
इनके गुरु रामानन्द थे। इनकी काव्य प्रतिभा इनके गुरु रामदास जी की कृपा से ही जागृत हुई। कबीरदास मूल रूप से एक सन्त कवि थे। वस्तुतः कबीर सन्त कवियों में सर्वाधिक प्रतिभाशाली थे। परंतु धर्म के बाहरी आचार-व्यवहार और कर्मकाण्डों में इन्हें जरा भी रुचि व आस्था नहीं थी। उस वक्त के समाज में व्याप्त कर्मकाण्डों व संकीर्णताओं को देख उनका मन व्याकुल हो उठता। फलस्वरूप उनकी व्यंग्यात्मक वाणी से विद्रोहपूर्ण स्वर से भावनाएं जाहिर हो जातीं। कबीर दास जी ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने रुढ़िवादी मानसिकता और परम्परा की जर्जर दीवारों को धराशायी कर दिया।
अशिक्षित होते हुए भी इनका काव्य क्षेत्र में योगदान विस्मयकारी है। ये भावना की प्रबल अनुभूति से युक्त, उत्कृष्ट रहस्यवादी, समाज सुधारक, पाखण्ड के आलोचक तथा मानवता की भावना से ओत प्रोत कवि थे। ये पढ़े लिखे नहीं थे यह इन्होंने स्वयं व्यक्त किया ‘मसि कागज छूयौ नहीं, कलम गही नहिं हाथ’। इन्होंने अपना ज्ञान सन्तों की संगति और देशाटन के माध्यम से अर्जित किया। इसी ज्ञान को इन्होंने अपने अनुभवों की कसोटी पर कसकर साधारण जनता के समक्ष उपदेशात्मक रूप में व्यक्त किया।
कबीर और उनके काव्य के विषय में डॉ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने कहा कि वे एक उच्च कोटि के साधक, सत्य के उपासक और ज्ञान के अन्वेषक थे। उनका समस्त साहित्य एक जीवनमुक्त सन्त के गूढ़ और गम्भीर अनुभवों का भंडार है।

                     हम तौ एक एक करि जाना।

          दोइ कहैं तिनहीं कौ दोजग जिन नाहिंन पहिचाना ।।

         एकै पवन एक ही पानीं एकै जोति समाना। 

        एकै खाक गढ़े सब भांडै़ एकै कोंहरा साना।।

        जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई।

        सब घटि अंतरि तूँही व्यापक धरै सरूपै सोई।।

        माया देखि के जगत लुभांनां काहे रे नर गरबाना।

        निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवाना।।

प्रसंग

प्रस्तुत पद पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-1 में संकलित निर्गुण परंपरा के सर्वश्रेष्ठ कवि कबीर के पदों से उद्धृत है। इस पद में, कबीर ने एक ही परम तत्व की सत्ता को स्वीकार किया है, जिसकी पुष्टि वे कई उदाहरणों से करते हैं।

व्याख्या

कबीरदास कहते हैं कि हमने तो जान लिया है कि ईश्वर एक ही है। इस तरह से मैंने ईश्वर के अद्वैत रूप को पहचान लिया है। हालाँकि कुछ लोग ईश्वर को अलग-अलग बताते हैं; उनके लिए नरक की स्थिति है, क्योंकि वे वास्तविकता को नहीं पहचान पाते। वे आत्मा और परमात्मा को अलग-अलग मानते हैं। कवि ईश्वर की अद्वैतता का प्रमाण देते हुए कहता है कि संसार में एक जैसी हवा बहती है, एक जैसा पानी है तथा एक ही प्रकाश सबमें समाया हुआ है। कुम्हार भी एक ही तरह की मिट्टी से सब बर्तन बनाता है, भले ही बर्तनों का आकार-प्रकार अलग-अलग हो। बढ़ई लकड़ी को तो काट सकता है, परंतु आग को नहीं काट सकता। इसी प्रकार शरीर नष्ट हो जाता है, परंतु उसमें व्याप्त आत्मा सदैव रहती है। परमात्मा हरेक के हृदय में समाया हुआ है भले ही उसने कोई भी रूप धारण किया हो। यह संसार माया के जाल में फैसा हुआ है। और वही संसार को लुभाता है। इसलिए मनुष्य को किसी भी बात को लेकर घमंड नहीं करना चाहिए। प्रस्तुत पद के अंत में कबीर दास कहते हैं कि जब मनुष्य निर्भय हो जाता है तो उसे कुछ नहीं सताता। कबीर भी अब निर्भय हो गया है तथा ईश्वर का दीवाना हो गया है।

विशेष

1. कबीर ने आत्मा और परमात्मा को एक बताया है।

2. उन्होंने माया-मोह व गर्व की व्यर्थता पर प्रकाश डाला है।

3. ‘एक-एक’ में यमक अलंकार है।

4. ‘खाक’ और ‘कोहरा’ में रूपकातिशयोक्ति अलंकार है।

5. अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।

6. सधुक्कड़ी भाषा है।

7. उदाहरण अलंकार है।

8. पद में गेयता व संगीतात्मकता है।


2.पद

संतो देखत जग बौराना।

साँच कहौं तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।

नेमी देखा धरमी देखा, प्रात करै असनाना।

आतम मारि पखानहि पूजै, उनमें कछु नहिं ज्ञाना।।

बहुतक देखा पीर औलिया, पढ़ै कितेब कुराना।

कै मुरीद तदबीर बतावैं, उनमें उहै जो ज्ञाना।।

आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना।

पीपर पाथर पूजन लागे, तीरथ गर्व भुलाना।।

टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना।


साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना।

हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुर्क कहै रहिमाना।

आपस में दोउ लरि लरि मूए, मर्म न काहू जाना।।

घर घर मन्तर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना।

गुरु के सहित सिख्य सब बूड़े, अंत काल पछिताना।

कहै कबीर सुनो हो संतो, ई सब भर्म भुलाना।

केतिक कहौं कहा नहिं मानै, सहजै सहज समाना ।।


व्याख्या

जो सत्य आचरण करता है, सत्य में मार्ग पर चलता है, उसे लोग पागल समझते हैं और सत्य बोलने पर मारने के लिए दौड़ते हैं। जो मायाजिनित झूठ का आचरण करता है, उससे लोग बातें करके खुश होते हैं। नियमों पर चलने वाले लोग, नेमी धर्मी लोग बहुत हैं जो सभी नियमों का पालन करते हैं, सुबह उठ कर स्नानकरते हैं लेकिन वे अपनी आत्मा की नहीं सुनते हैं। ऐसे लोग अपनी आत्मा को मार चुके होते हैं, आत्मा की नहीं सुनते हैं, वे पत्थर में ईश्वर को ढूंढते हैं और प्रतीकात्मक पूजा करते हैं, जबकि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं है, मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है, सत्य की राह पर चलना और इंसान को इंसान समझना ना की वह किस धर्म का है, किस जाती का है। 

वस्तुत यहाँ पर साहेब ने हिन्दू धर्म पर कटाक्ष किया है। हिन्दू धर्म को मानने वाले अपने नियमों का पालन करते हैं लेकिन उनके आचरण में मिथ्या और झूठा आचरण, दिखावे की भक्ति ही होती है। कण कण में ईश्वर का वास है उसे प्राप्त किया जा सकता है सत्य से। सत्य यही है की सभी लोगों को समान समझे, किसी पर धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक अत्याचार ना किया जाय, यही सच्ची भक्ति है।


वहीँ दूसरी तरफ मुसलमान भी आडम्बर और पाखंड से परे नहीं है। मुस्लिक धर्म के उपदेशक और ओलिया आदि बड़ी बड़ी किताबों को तो पढ़ लेते हैं लेकिन उन्हें अपने जीवन और आचरण में नहीं उतारते हैं। ईश्वर की प्राप्ति के वे बहुत से मार्ग और माध्यम बताते हैं लेकिन उन्हें स्वंय ही आत्म ज्ञान नहीं है तो वे लोगों को क्या बताएँगे ? भाव है की वे मात्र आडम्बर ही कर रहें हैं। वहीँ दूसरी और मानवता को भूल कर योग करने वालों पर भी साहेब व्यंग्य कसते हैं और कहते हैं की ऐसे लोग अहंकार करके एक स्थान पर बैठे रहते हैं लेकिन उन्होंने भी सच्चे रहस्य को प्राप्त नहीं किया है। मानवता को भूलकर हिन्दू धर्म के लोग पीपल को पूजते हैं, पत्थर को पूजते हैं लेकिन क्या इनसे ईश्वर की प्राप्ति संभव है ? नहीं, जब तक व्यक्ति छद्म आचरण का त्याग नहीं करता है तब तक ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। मुस्लिम लोग टोपी पहन लेते हैं, हिन्दू धर्म के अनुयायी माथे पर तिलक लगा लेते हैं, माला फेरते हैं जो साहेब के अनुसार और कुछ नहीं छद्म आचरण ही है और ऐसे लोग सखी (साक्षी) शब्द आदि को भूल गए हैं क्योंकि इन्होने आत्म ज्ञान की प्राप्ति नहीं की है।

हिन्दू धर्म के लोगों को राम प्यारा है और मुस्लिम धर्म के लोगों को रहमान प्यारा है। इसी बात को लेकर दोनों आपस में ही लड़ रहे हैं, लेकिन दोनों ने ही रहस्य को नहीं जाना है। रहस्य क्या है, रहस्य है की सभी का मालिक एक ही है उसे प्रथक प्रथक कर दिया है और उसके नाम भी कई रख दिए हैं, लेकिन है एक ही। पाखंडी लोग घर घर घूम कर लोगों को मन्त्र देते फिर रहे हैं लेकिन वे स्वंय भी अज्ञान में ही डूबे हुए हैं। अन्तकाल में ऐसे लोगों के हाथ सिर्फ पछतावे ही लगना है और कुछ भी नहीं। 

अंत में साहेब की वाणी है की ईश्वर की प्राप्ति के लिए कोई विशेष प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है, वह तो सहज भाव से ही प्राप्त किया जा सकता है। सहज भाव क्या है ? सहज भाव है की मानवता के धर्म का पालन करें, जीव के प्रति दया भाव रखें, मानव को मानव समझे और सभी के प्रति सम भाव रखें। सभी के धर्मों का आदर करें, मोह और माया से दूर रहें, मिथ्या और आडम्बर से दूर रहें यही सहज भाव है।

कबीर साहेब ने जीवन पर्यंत धार्मिक और सामजिक आडम्बरों का ना केवल विरोध किया बल्कि लोगों का सत्य आचरण की और मार्ग भी प्रशस्त किया। अपने जीवन की परवाह ना करते हुए धार्मिक और सामंती ठेकेदारों के कारनामों से लोगों को बताकर उन्हें भी सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। साहेब की आवाज सदा ही समाज के दबे कुचले लोगों की आवाज बनी रही। धार्मिक पाखंड हो या सामाजिक सभी का खंडन कबीर साहेब ने किया है। साहेब का जो मूल सन्देश है वह यह है की आडम्बर और मिथ्या आचरण का त्याग करो और जो सत्य की राह है उस पर चलो, मानव जीवन तभी सार्थक होगा। मनुष्य को मनुष्य समझना ही सबसे बड़ा धर्म है और कल्याण का मार्ग है।


कबीरदास की भाषा, शैली 

कबीर की भाषा एक सन्त की भाषा थी। क्योंकि संतों की संगति से ही इन्हें सब कुछ सीखने का मौका मिला। ये फक्कड़ प्रकृति के सन्त थे। इन्होंने समाज में फैले आडम्बरों का खुलकर प्रबल विरोध किया और अज्ञान में डूबी मानवता को एक प्रकाश की ओर ले जाने का जीतोड़ प्रयोस किया। इसी कारण इनकी भाषा साहित्यिक न हो सकी। इनकी रचनाओं में खड़ीबोली, ब्रज, अरबी, फारसी, पंजाबी, भोजपुरी, बुन्देखण्डी आदि भाषाओं के शब्द देखने को मिलते हैं। इसी कारण इनकी भाषा को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सधुक्कड़ी भाषा कहा है। तो हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं - “भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा लिया - बन गया है तो सीधे-सीधे, नहीं तो दरेरा देकर।भाव प्रकट करने के लिए इनकी भाषा पूर्णतः सक्षम है।

इन्होंने सरल, सहज व सरल शैली में अपने उपदेश दिये। इसी कारण इनकी उपदेशात्मक शैली क्लिष्ट व बोझिल प्रतीत नहीं होती। इसमें स्पष्टता, स्वाभाविकता, सजीवता, एवं प्रवाहमयता के दर्शन होते हैं। इन्होंने चौपाई, दोहा व पदों की शैली अपनाई व उनका सफलतापूर्वक प्रयोग किया।

 






Monday

गुरु पूर्णिमा

 



               गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

              गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा हैं,जो अपने शिष्यों को नया जन्म देता है, गुरु ही विष्णु हैं जो अपने शिष्यों की रक्षा करता है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात परमब्रह्म हैं; क्योंकि वह अपने शिष्य के सभी बुराईयों और दोषों को दूर करता है।ऐसे गुरु को मैं बार-बार नमन करता हूँ।अपनी संस्कृति और विरासत के लिए पहचाने जाने वाले भारत देश में गुरु पूर्णिमा का पर्व बेहद महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व गुरुओं को समर्पित एक आदर्श पर्व है।

आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को कई पुराणों, शास्त्रों, चारों वेदों को विभाजित करने वाले एवं हिन्दू धर्म के महाग्रंथ श्री महा भगवतगीता की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास जी का भी जन्म हुआ था।उनकी जयंती के उपलक्ष्य में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाता है और इस पर्व को व्यास पूर्णिमा और व्यास जयंती के नाम से भी जाना जाता है। महार्षि वेद व्यास जी को गुरु-शिष्य परंपरा का प्रथम गुरु माना गया है।

गुरु हर किसी के जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है गुरु के महत्व और इसके मूल्यों को सिर्फ शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता है। गुरु हमारे जीवन में सभी अंधकारों को मिटाकर हमें प्रकाश की तरफ आगे बढ़ाता है और सही मार्गदर्शन कर हमें सफलता के पथ पर आगे बढ़ाता है।इसलिए हिन्दू धर्म के शास्त्रों में गुरु को भगवान का दर्जा दिया गया है। गुरु के बिना कोई भी व्यक्ति ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता है और न ही अपने जीवन में सफलता हासिल कर सकता है।

गुरु के बिना किसी भी व्यक्ति का जीवन बिना नाविक के नाव की तरह होता है। जिस तरह बिना नाविक के नाव दिशाहीन होकर चलती है या फिर बेसहारा भंवर में फंस जाती है,ठीक उसी तरह बिना गुरु के मनुष्य जीवन रूपी भंवर में फंसा रहता है और दिशाहीन हो जाता है, उसे यह कभी ज्ञात नहीं होता है कि उसे जाना किस तरफ है।गुरु अपनी पूरी जिंदगी अपने शिष्य को योग्य और सफल बनाने के लिए समर्पित कर देते हैं। इसलिए हमारे हिन्दू धर्म और शास्त्रों में गुरुओं को विशिष्ट स्थान दिया गया है और गुरु को भगवान का रुप मानकर गुरु पूर्णिमा के दिन उनका पूजन किया जाता है और उनके प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है।

वहीं गुरु की अद्भुत महिमा का बखान तो हिन्दी साहित्य के कई महान कवियों ने भी अपने लेखों, दोहों आदि के माध्यम से भी किया है।महान कवि कबीर दास जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से गुरु को भगवान से बढ़कर दर्जा देते हुए कहा है कि –

गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय।

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥”

संत कबीर दास जी ने अपने इस दोहे में यह कहा है कि अगर गुरू और गोबिंद अर्थात भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो हमें किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को? उन्होंने बताया कि ऐसी स्थिति में हमें अपने गुरू के चरणों में अपना शीश झुकाना चाहिए क्योंकि गुरु ने ही भगवान तक जाने का रास्ता बताया है, अर्थात मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाया है और गुरु की कृपा से ही भगवान के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।गुरु, सभ्य समाज का निर्माण करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं एवं राष्ट्र के विकास में मद्द करते हैं। गुरु, परमात्मा और संसार के बीच एवं शिष्य और ईश्वर के बीच एक सेतु की तरह काम करते हैं।

गुरु के बिना किसी भी व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है, और बिना ज्ञान का कोई भी व्यक्ति आत्मसात नहीं कर सकता है। गुरु ही मनुष्य को उसके कर्तव्यों का बोध करवाता है एवं हमारे अंदर धैर्य अथवा धीरज पैदा करता है,ज्ञान का बोध करवाता है,और मोक्ष का मार्ग बताता है। इसलिए किसी विद्धान ने कहा भी है कि –

गुरु बिना ज्ञान नहीं और ज्ञान बिना आत्मा नहीं,

कर्म, धैर्य, ज्ञान और ध्यान सब गुरु की ही देन है।।”

गुरु की महिमा का तो जितना भी बखान किया जाए उतना कम है। “गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।गु

रू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।। 

Saturday

चीफ की दावत समीक्षा


                          चीफ की दावत समीक्षा 

चीफ की दावत कला की दृष्टि से भीष्म साहनी की प्रसिद्ध कहानी है। ‘चीफ की दावत’ एक ऐसी ही कहानी है, जिसमें स्वार्थी बेटे शामनाथ को अपनी विधवा बूढ़ी माँ का बलिदान फर्ज ही नजर आता है। भीष्म साहनी ने शामनाथ के माध्यम से शिक्षित युवा पीढ़ी पर करारा व्यंग्य किया है। आज के शिक्षित युवा वर्ग अपने माता पिता को बोझ समझते हैं। व्यक्ति अपनी सुख सुविधा के लिए अपने माता पिता को छोड़ देते हैं।

वे यह तक भूल जाते हैं कि आज जिस समाज मे तुम रह रहे हो उनकी बदौलत है। अपने बच्चो को काबिल बनाने के लिए माता पिता अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं। उनका पूरा जीवन अपने बच्चों की खुशी के लिए बलिदान में व्यतीत हो जाता है।

चीफ की दावत समीक्षा – 

कथानक

कहानी के नायक सामनाथ अपने मध्यवर्गीय परिवार को आधुनिक बोध से जकड़े हुए है। नए पन का ढोंग उन्हें मां और पत्नी के मध्य चमकीले पर्दे की भांति लटकाए हुए हैं या आधुनिकता की गंध सामान्य माध्यम परिवारों में देखी जा सकती है। पुरानी मान्यताओं और परंपराओं के ढांचे से निकले माता-पिता जब अपनी संतानों को नए रंग में पाते हैं तो उन्हें आशय मिश्रित असंतोष के कारण भीतर ही भीतर गोटन का अनुभव होता है।

शामनाथ नौकरी पेशा व्यक्ति है- इनकी पदोन्नति की संभावनाएं संबंधित चीफ साहब पर निर्भर करती है चीफ साहब है कि बड़े ही फैशनेबल और संपन्न व्यक्ति व अमेरिकन है। सामनाथ अपनी हैसियत और परिस्थिति को ध्यान में रखकर जीना कबूल नहीं करते। वे चीफ साहब को दावत देते हैं की खुशामद करने से हमारी पदोन्नति मैं उनका सहयोग मिलेगा अपनी आय के हिसाब से ना रहकर दिखावे की जिंदगी जीना शामनाथ को बेहतर लगने लगा था। परिणामत: हर प्रकार की भौतिकसुख सुविधाएं जुटाने में आर्थिक टूटन आ जाती है। किंतु शामनाथ अपनी उन्नति के लिए सब कुछ करने को तैयार है।

शामनाथ ने घर को खूब सजाया-संवारा है कमरे की सफाई घर के सामान की यथा स्थान व्यवस्था, भोजन-सामग्री की समय से तैयारी आज सब कुछ कर ली है। अब समस्या यह है कि मकान में सब नया आधुनिकता से ओतप्रोत होते हुए भी मां पुरानी है। इस पुराने पन से छुटकारा पाने का सामना को कोई उपाय नहीं सुजाता कभी वह सोचते हैं। आप चीफ की दावत समीक्षा पढ़ रहे हैं।

कि पड़ोसी के घर भेज दिया जाए और कभी कमरे में बंद कर दिया जाए। वरना कहीं चीफ साहब के सामने ना पड़ जाए और उसकी शान में धब्बा लग जाए अथवा उनके व्यवहार से चीफ साहब पर्सन हो जाए। अंत में उन्होंने या निर्णय लिया कि मां को अच्छे ढंग से पहना उड़ा कर रखा जाए कि संयोगवश चीफ साहब की नजर पड़ ही जाए तो उनकी स्थिति बिगड़ने ना पावे मां को बताया गया। कि उनके आने पर वह कैसी रहेंगी और कैसे बोलेंगे मां असमंजस में एक नई दुनिया के घेरे में स्वयं को बंधा अनुभव करने लगी है।

किंतु इस स्थिति में भी वह अपने पुत्र को पदोन्नति के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं। साहब के आने पर मां को अंधेरे में बैठाया गया है किंतु पार्टी का पहला दौर समाप्त होता है और लोग भोजन पर जाने लगते हैं। तो चीफ साहब के दस्त सामनाथ की मां पर जाती है। कि बड़े प्रेम से मिलकर मां का आदर करते हैं और उन्हें भारतीय संस्कृति की प्रतीक रूप मानते हैं।

उन्होंने मां से लोक कला के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त की और फिर एक गीत सुनाने का प्रस्ताव रखा वह मासी लोक कला का प्रतीक फुलकारी मांगते थे। और उससे लोकगीत सुनकरबहुत प्रसन्न होते हैं। जबकि पुत्र के संतुष्ट होने पर मां हरिद्वार जाने की इच्छा प्रकट करती है। पुत्र का पूजा व्यवहार होने पर भी आजमा उनके लिए सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हैं। नई पीढ़ी की व अनैतिक और अब व्यावहारिक मान्यताएं व महत्वकांक्षी आएं हमारे पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन के लिए घातक दिखाई देती है।प्रेम के मूल्य को ही नैतिक आधार मिलना चाहिए। आप चीफ की दावत समीक्षा पढ़ रहे हैं।

चीफ की दावत समीक्षा – कथोपकथन

कहानी के संवाद छुट्टी ले और व्यंग्यात्मक है। कहानीकार के नई कहानी के संवाद शैली को मानव मनोविश्लेषण के समायोजन में प्रयुक्त किया है।मन की गहरी चाल मनुष्य की छवि को धूमिल भी कर लेती है।पात्रों की संभावित विकास व मुख भावना आधुनिकता की चौखट से टकराकर चोट खा जाती है।संवादों के द्वारा कथानक को खींचने का प्रयास नहीं तो सार्थक है और कहीं महंगा साबित होने लगता है। छोटे-छोटे वाक्यों द्वारा कथन तो पैन आपन सिद्ध होता है।शब्दों और वाक्यों विन्यास की ध्वनियों में अर्थ की व्यंजना होती है।

मुहावरे आदि के प्रयोगों में कहानीकार की कोई विशेष रूचि नहीं है।तथ्य के विकास और चरित्रों के उद्देश्य पर निर्माण में संवाद योजना उपयुक्त है तथा तो इन्हें कह देंगे कि अंदर से दरवाजा बंद कर ले मैं बाहर से ताला लगा दूंगा और जो सो गई। तो डिनर का क्या मालूम कब तक चले 11:11 बजे तक तो तुम लोग ड्रिंक ही करते रहते हो। अच्छी वाली या भाई के पास जा रही थी। तुमने यूं ही कुछ अच्छा बनने के लिए बीच में टांग अड़ा दी। आप चीफ की दावत समीक्षा पढ़ रहे हैं।

चीफ की दावत कहानी का चरित्र चित्रण

कहानी के पात्र वर्तमान परिस्थितियों के है। आज का परिवारिक जीवन इन्हीं यथा स्थितियों में स्थित है या विसंगति अतिशय स्वार्थपरता और स्थिर बुद्धि का परिणाम है सामना इस कहानी का केंद्र बिंदु है। जो अपनी पदोन्नति और भौतिक जीवन के सुख क्षेत्रों की प्राप्ति से 100 पदों हेतु आर्थिक लाभ देखता है। उसके या नहीं जाना कि मां के निस्वार्थ प्रेम और भारतीय आदर्श को खोदकर हम पश्चिमी सभ्यता की होल फ्रांस में फसने जा रहे हैं। आप चीफ की दावत समीक्षा पढ़ रहे हैं।

शाम नाथ के प्रतिनिधि आज के भारतीय परिवारों में बहुसंख्यक है या दो एकात्मक स्थिति मनुष्य के चरित्र का खंडन करती जा रही है।शामनाथ की पत्नी पति के शौक से गांठ बांधे हुए हैं। उनकी मान्यता भी ऐसी है कि शामनाथ की मां है कि बुढ़ापे में एक युग बिताकर नए युग की धरती को मां जालपा ले बैठी हैं। पुत्र का विवाह मूवी उन्हें यहां तक खींच लाया की घुंघट में जीने वाली भारतीय महिला अमेरिकन जीत के समक्ष लोकप्रिय सुनने को बाध्य हो जाती है। चीफ है कि भारतीय जीवन दर्शन की पहचान करने में तत्पर है।

चीफ की दावत समीक्षा – कहानी का उद्देश्य

मध्यवर्ती आर्थिक टूटन कुंडा ग्रस्त जीवन शैली भोग विलास कि कृष्णा और अंतर्विरोध से उत्पन्न चुनावी कहानी में सामाजिक विषमताओं के परिणाम है।भारतीय संस्कृति और आदर्शों को तोड़कर पाश्चात्य मान्यताओं की ललक व्यक्ति की मानसिक पीड़ा को बढ़ावा ही देगी।मां के अस्तित्व पर खतरे की घंटी बजने ही लगी है और पुत्र के प्रति समर्पण का भाव भी नित्या होने की आशंका है।इन तथ्यों की खोज और समाधान के लिए इस कहानी को हम सफलतम कर सकते हैं।

Sunday

गणतन्त्र दिवस


                सब के अधिकारों का रक्षक 

                अपना यह यह गणतंत्र पर्व है

                लोकतंत्र ही मंत्र हमारा

                हम सबको इस पर गर्व है!"

जैसा कि हम सभी जानते हैं काल तो प्रवाहमय होता है! इसमें कुछ भी स्थिर नहीं होता! यहां पर हमेशा बदलाव तो होता रहता है! परंतु पुरानी यादों को भुलाया नहीं जा सकता! मुझे इतिहास कि वह स्वर्णिम घटनाएं याद आ रही हैं! जब हर भारतीय अपने हाथों में आजादी की मशाल लिए हुए और सब की जबान पर बस एक ही नारा गूंज रहा था कि भारत माता की जय महात्मा गांधी की जय इंकलाब जिंदाबाद तभी गोलियों की आवाज गूंजते हुए आती हैं और सीने पर गोलियां खाते हुए लहूलुहान देशभक्त जमीन पर गिर पड़ते हैं! परंतु कोई आह नहीं कोई पश्चाताप नहीं दिख रहा, दिख रहा है तॊ बस एक अलौकिक देश और उस देश में एक अटल विश्वास कि हमारा भारत अवश्य स्वतंत्र होगा!15 अगस्त 1947 को यह विश्वास प्रतिफलित भी हुआ क्योंकि-

                     "यह देश महापुरुषों का है!

                      यह देश वीर बलवा बलवानो का

                      यह देश साधको संतों का 

                      यह देश गुड़ी विद्वानों का

                      यह देश गुड़ी विद्वानों का"

महापुरुषों की उपस्थिति में हमारे देश की स्वतंत्रता तब तक अधूरी रहती जब तक यहां का संविधान ना रचा जाए!अतः राष्ट्र निर्माताओं की अधीनता में इस देश का संविधान 20 जनवरी 1950 को लागू किया गया! संविधान तो लागू हो गया पर यह बात अब भी जहन में रखनी शेष थी कि-

              "गौरव गाथा बार-बार दोहरानी है

       प्यारा भारत देश हमारा हम सब हिंदुस्तानी हैं!"

परंतु अभी भी भारत के सामने ऐसी विषम परिस्थितियां थी! जो मनुष्य के सपनों को खंडित कर देती है, तब मन में बस यही भाव जगने लगता है कि-

          "सोचा था अपने देश को खुशियों से सजाएंगे

          क्षमता और सद्गुणों से भारत में बहारें लाएंगे!"

 गणतंत्र की स्वतंत्रता के लिए यह अति आवश्यक है कि हम अपनी सभ्यता संस्कृति मौलिक चिंतन और वैचारिक स्वतंत्रता को बनाए रखें! लेकिन आज ऐसा लगता है,कि मिली राजनैतिक स्वतंत्रता पर विचार परतंत्र है-

           "पाश्चात्य चिंतन चरित्र से कहां हुए स्वतंत्र हैं,

           अभी स्वदेशी तंत्र अपेक्षित मिला कहां सम्मान है,

            और किसी कोने में बैठा रो रहा संविधान है,

           और किसी कोने में बैठा रो रहा संविधान है!"

इस रोते हुए संविधान को प्रबल, सशक्त, सफल और प्रभावशाली बनाने का अधिकार अगर किसी को है तो वह सिर्फ हम देशवासियों को है,क्योंकि चुनाव के माध्यम से एक मजबूत नेतृत्व का चयन करके अपने संविधान को और परी परिपुष्ट बनाते हैं!74 वें गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत बधाई देते अंत में बस इतना कहना है कि-

           "इस देश की कीमत जब जब हमने पहचानी है

            हमारे देश का बच्चा-बच्ची बना देश सेनानी है

            जाति-पाती और भाषा का द्वेष पनपने ना देंगे

           अब इन आधारों पर हिंदुस्तान को बटने ना देंगे

            एकता के सतरंगों से सजाएंगे संसार को

            गणतंत्र उपासक बनकर सच्चे 

            उपहार देंगे राष्ट्र को

             उपहार देंगे राष्ट्र को"







आधुनिकता की अवधारणा


 आधुनिकता एक सापेक्षिक अवधारणा है !प्राचीन मूल्यों के सापेक्षता में वर्तमान नवीन मूल्यों का निर्धारण ही आधुनिकता है!

समीक्षक डॉ जगदीश गुप्त के अनुसार आधुनिकता का मूल आधार मानवतावादी दृष्टि है!यह दृष्टि ही आधुनिक दृष्टिकोण है!

आधुनिकता के लक्षण 

1. आधुनिकता एक सापेक्षिक अवधारणा है!

2. आधुनिकता की व्याख्या अतीत की समकक्षता एवं सापेक्षता में ही संभव है!

3. जो भी आज आधुनिक है वह भविष्य में पुरातन है!

4. अनुभूति और संवेदना का नयापन ही आधुनिकता कहलाता है!

5. आधुनिकता अतीत से जुड़कर सुरक्षित रह सकती है! 6.आधुनिकता का मूल आधार मानवतावादी दृष्टि है!

7. साहित्य, धर्म व दर्शन सभी के प्रति दृष्टिकोण का आविर्भाव ही आधुनिकता है!

8. साहित्य की सभी विधाओं में आधुनिकता स्पष्ट दिखाई देती है!

9. आधुनिकता ज्ञान विज्ञान और टेक्नोलॉजी के कारण संभव है!

10. आधुनिक ज्ञान विज्ञान ने मनुष्य को बहुत कुछ बुद्धि सम्मत बना दिया था नीत्शे की इस घोषणा से कि ईश्वर मर गया है भौतिक जगत में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया

Saturday

कम समय में परीक्षा के लिए कैसे पढ़े

 


आने वाले है एक्जाम और आप सभी हो रहे है परेशान तो बिल्कुल भी परेशान होने की जरूरत नहीं हैं, बस पढिए इस ब्लॉग से जानिए कैसे करनी हैं तैयारी । 

दोस्तों एग्जाम पास आते ही हम सभी परेशान होने लगते हैं और परीक्षा का डर मन पर हावी होने लगता हैं, लेकिन मैं आपको बताऊंगा कि आपको कैसे पढ़ना हैं, कैसे तैयारी शुरू करनी हैं. 

1. सोचो कम, करो ज्यादा 

हम सभी जिस उम्र में है उस उम्र में करने से पहले सोचते हद से ज्यादा है जो की सही नहीं हैं। सिर्फ उतना ही सोचे जितने की जरूरत हैं। सोच आते ही उस पर वर्क करना शुरू कर देना चाहिए। ये ट्रिक सिर्फ परीक्षा के समय ही नहीं जिंदगी में भी काम आएगा। इसलिए सोचो कम और पढ़िए ज्यादा। मान लीजिए कि आपने सोचा की मुझे पढ़ना है न तो उसके बाद ज्यादा सोचिए मत बस पढ़ना शुरू कर दीजिए । 

2. पढ़ना कैसे शुरू करें 

सबसे पहले अपने पाठ्यक्रम को देखे और फिर उसके हिसाब से पढ़ना शुरू कर दें ।आप सभी कॉलेज में हैं तो टीचर पढ़ाएगा या नहीं, कैसे पढ़े सब छोड़ कर पाठ्यक्रम देखे और पाठ्यक्रम यूनिट के हिसाब से जहां से वो यूनिट मिलती है वहाँ से उसको पढ़ना शुरू कर दें, सिर्फ पढ़े, रट्टा न मारे। पढ़ने के समय हाथ में एक पेन , एक नोटबुक जरूर रखे और जो जरूरी लगे उसको साथ साथ नोट करते जाएं। आमतौर पर ऐसा होता है कि पढ़ाई के दौरान अपना मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट होता हैं जिससे लगातार ध्यान बंटता है! पढ़ाई के दौरान कभी भी ऐसे उपकरण नहीं रखने चाहिए, इससे आपकी एकाग्रता प्रभावित होती है और आप अपना समय बर्बाद करते हैं। आपको केवल वही चीजें लेनी चाहिए जो आपको वास्तव में पढ़ने के लिए चाहिए जैसे नोटबुक, सिलेबस, प्रश्न पत्र और स्टेशनरी आदि। साथ ही, अपनी जरूरत की चीजें एक जगह पर रखें ताकि आपको उठने या अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ने की जरूरत न पड़े। अगर ऑनलाइन पढ़ रहे हैं तो सोशल मीडिया एप्प की सूचना बंद कर दें या अगर ऑफलाइन पढ़ रहे है तो फोन को उल्टा करके रख दें । 

3. पढ़ाई के दौरान लंबे ब्रेक न लें 

पढ़ने के समय ज्यादा देर का ब्रेक न लें और 45 मिनट से ज्यादा देर न बैठे एक बार में। अगर 45 मिनट लगातार पढ़ रहे हैं तो 15 मिनट का ब्रेक लें और उसके बाद फिर से पढाई शुरू करें। अच्छी नींद लें और अच्छा खाएं ...

4. याद रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात 

यह है कि पढ़ाई के दौरान खुद को चौकस रखने के लिए आपको स्वस्थ खाना चाहिए और आराम करना चाहिए। इसके लिए, आपको 6-7 घंटे सोना चाहिए। फल, सब्जी, फलों का रस जैसे स्वस्थ खाएं। कुछ शारीरिक व्यायाम और ध्यान करने के लिए समय निकालें, इससे आपको शारीरिक और मानसिक फिटनेस में सुधार करने में मदद मिलती है। इसके अलावा, कृपया जंक फूड, चीनी लेपित उत्पादों और कैफीन से बचें क्योंकि ये चीजें आपके शरीर को अधिक थका देती हैं और आप पढ़ाई के दौरान ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते।

5 . पिछले वर्षों के प्रश्न पत्रों का विश्लेषण करें 

आपके पास प्रत्येक चीज़ का अध्ययन करने के लिए पहले से ही कम समय बचा है, इसलिए परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए, आपको अपने समय का कुशलतापूर्वक उपयोग करने की आवश्यकता है। आपको अपनी आगामी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम के अनुसार पिछले वर्षों के प्रश्न पत्र के विश्लेषण के साथ शुरुआत करनी होगी। पिछले वर्षों के 'कम से कम 5-10 वर्षों के प्रश्न पत्र' एकत्र करें। विभिन्न अध्यायों के प्रश्नों के वेटेज को क्रॉस-चेक करें, ताकि अधिक वेटेज और कम महत्वपूर्ण अध्यायों वाले अध्यायों की पहचान की जा सके। आपको कठिन, औसत और आसान स्तर के प्रश्नों और अध्यायों के बारे में पता चल जाएगा। इससे आपको हर अध्याय से महत्वपूर्ण विषयों को समझने में मदद मिलेगी, जिनका आपको परीक्षा के लिए अध्ययन करना चाहिए..

6 . प्राथमिकता के अनुसार अध्ययन करें 

अब आपको प्रश्नों की संख्या, अंक भार और कठिनाई स्तर के अनुसार महत्वपूर्ण अध्यायों के लिए प्राथमिकता निर्धारित करने की आवश्यकता है। प्राथमिकता सूची के अनुसार प्रत्येक अध्याय के लिए समय निर्धारित करें और अधिक वेटेज या आसान अध्यायों वाले अध्यायों से शुरू करें, ताकि आप कठिन अध्यायों की तैयारी के लिए अपना समय और प्रयास बचा सकें। सबसे महत्वपूर्ण बात, अपने टाइम टेबल स्टडी प्लान में बार-बार बदलाव न करें। बस प्राथमिकता सूची के अनुसार एक अध्ययन कार्यक्रम निर्धारित करें और बेहतर परिणामों के लिए उसका पालन करें।।

7. यात्रा के समय का उपयोग करे 

आज कल हम सोशल मीडिया यानि इंस्टाग्राम, स्नैपचैट,फेसबुक के बिना नहीं रह सकते। कई बार हमारे दोस्तों को शिकायत रहती हैं कि आप उनसे आप बात नहीं करते तो अपने यात्रा के समय का उपयोग दोस्तों से बात करने में लगाए या सोशल मीडिया का उपयोग करें। इससे आपका सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि आपको अलग से इसके लिए समय नहीं निकालना पड़ेगा।  

सुभाष चन्द्र बोस....


आओ मिलकर याद करें जन-जन ह्रदय विजेता को 


उस सुभाष बलिदानी को नेताओं के नेता को


 था अलग ही बॉस का ओरा, 


माने लोहा दुश्मन भी गोरा


घूमा रूस जर्मनी जापान 


स्वतंत्र हो भारत यही ध्येय प्रधान


 फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया


हिंद फौज का संचालन किया


कहा खून के बदले आजादी दूंगा 


कीमत लेस ना मैं कम लूंगा,


है रोष लहू में तो आ जाओ


 खाकर कसम यह दिखलाओ 


अब सिंहासन दूर नहीं


सुनते ही लहू की नदी वही 


तन-मन-धन समर्पण भारत को किया 


जब तक जिया देशहित जिया


 है अमर सुभाष सदा क्रांतिकारी विचारों में


समय-समय पर आती है 


विभूतियां अलग-अलग किरदारों में 


आओ मिलकर याद करें


करें जन-जन ह्रदय विजेता


उस सुभाष बलिदानी को नेताओं के नेता को.......




Sunday

"हमारा गौरवशाली अतीत और आधुनिकता का आवरण ओढ़े वर्तमान' विषय पर दो मित्रो के बीच संवाद (वर्तालाप)

 रमेश- सुरेश! क्या तुमने आज की खबर पढ़ी

सुरेश- हाँ पढ़ी

रमेश- हमारे भारतीय समाज को ना जाने क्या हो गया है, जहाँ देखा साम्प्रदायिक दंगे, चोरी लूटपाट तथा जातिगत भेदभाव नजर आता है.. 

सुरेश- हाँ, तुम ठीक कह रहे हो, हमारा अतीत वर्तमान से अधिक गौरवशाली था, हमारी भारतीय संस्कृति और एकता का उदाहरण पूरे संसार में दिया जाता था.. 

रमेश- लेकिन सुरेश! आज हम जिस अधुनिकता की बात करते हैं, वह हमारे अतीत के गौरव को नस्ट करती जा रही है|हम जितने आधुनिक हो रहे हैं, उतने ही संवेदनहीन व धर्म जाति के नाम पर बट रहे हैं.

सुरेश- हाँ, रमेश तुम ठीक कहते हो.. 



Friday

इश्क़

 



                           इश्क़ किया था

               हमने भी हम भी रातों को जागे थे

                               था कोई

             जिसके पीछे हम भी नंगे पाँव भागे थे। 








एक टोकरी भर मिट्टी- माधव राव स्प्रे



किसी श्रीमान् जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोंपड़ी तक बढा़ने की इच्‍छा हुई, विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले, पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी; उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोंपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पाँच बरस की कन्‍या को छोड़कर चल बसी थी। अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। जब उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दु:ख के फूट-फूट रोने लगती थी। और जबसे उसने अपने श्रीमान् पड़ोसी की इच्‍छा का हाल सुना, तब से वह मृतप्राय हो गई थी। उस झोंपड़ी में उसका मन लग गया था कि बिना मरे वहाँ से वह निकलना नहीं चाहती थी। श्रीमान् के सब प्रयत्‍न निष्‍फल हुए, तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्‍होंने अदालत से झोंपड़ी पर अपना कब्‍जा करा लिया और विधवा को वहाँ से निकाल दिया। बिचारी अनाथ तो थी ही, पास-पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी। एक दिन श्रीमान् उस झोंपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहाँ पहुँची। श्रीमान् ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहाँ से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली, ''महाराज, अब तो यह झोंपड़ी तुम्‍हारी ही हो गई है। मैं उसे लेने नहीं आई हूँ। महाराज क्षमा करें तो एक विनती है।'' जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा, ''जब से यह झोंपड़ी छूटी है, तब से मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत-कुछ समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल। वहीं रोटी खाऊँगी। अब मैंने यह सोचा कि इस झोंपड़ी में से एक टोकरी-भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्‍हा बनाकर रोटी पकाऊँगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले आऊँ!'' श्रीमान् ने आज्ञा दे दी। विधवा झोंपड़ी के भीतर गई। वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्‍मरण हुआ और उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। अपने आंतरिक दु:ख को किसी तरह सँभालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आई। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान् से प्रार्थना करने लगी, ''महाराज, कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइए जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूँ।'' जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए। पर जब वह बार-बार हाथ जोड़ने लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके मन में कुछ दया आ गई। किसी नौकर से न कहकर आप ही स्‍वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े। ज्‍योंही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्‍योंही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है। फिर तो उन्‍होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्‍थान पर टोकरी रखी थी, वहाँ से वह एक हाथ भी ऊँची न हुई। वह लज्जित होकर कहने लगे, ''नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।'' यह सुनकर विधवा ने कहा, ''महाराज, नाराज न हों, आपसे एक टोकरी-भर मिट्टी नहीं उठाई जाती और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी है। उसका भार आप जन्‍म-भर क्‍योंकर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए।" जमींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्‍य भूल गए थे पर विधवा के उपर्युक्‍त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गयीं। कृतकर्म का पश्‍चाताप कर उन्‍होंने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापिस दे दी।

समकालीन हिंदी कहानी

समकालीन हिन्दी कहानी एक नये वेग, नयी वेश-भूषा, और नई तकनीक एवं विचारधारा के साथ आगे बढ़ी है। समकालीन कहानी में पुराने - नए सभी कहानीकार अविराम गति से कहानी - साहित्य का सृजन करते रहे है। जीवन में जटिल और व्यापक यथार्थ की सीधी और बेबाक अभिव्यक्ति समकालीन कहानी की विशेषता है। इसमें जहाँ शिल्प की नीवनता है भाव बोध और उद्देश्य की नवीनता है, वहीं भाषागत नवीनता भी विद्यमान है। आज की कहानी बदली हुई मानसिकता की कहानी है। समकालीन कहानीकार अनुभुत सत्य के प्रति अधिक आग्रह रखता है। अनेक नारों अैर वादों से निकलकर समकालीन कहानी पुनः अपने  सहज और सन्तुलित रूप को प्राप्त कर रही है विसंगतियों से सीधा साक्षात्कार करती हुई समकालीन कहानियाँ जीवन के भोगे हुए सत्यों को ईमानदारी  व प्रखरता के साथ अभिव्यक्त करती हुई प्रगति पथ पर अग्रसर है।

कहानी मनुष्य की अभिव्यक्ति का आदि रूप है या नहीं इस विवाद में पड़े बिना यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि अपने अनुभव को दूसरों से कहना मनुष्य की आदिम सभ्यता से ही शुरू हो गया होगा। आदिम सभ्यता से लेकर अब तक मानव विकास - यात्रा का इतिहास जिन कलारूपों में मिलता है, कहानी उनमें से एक प्रधान रूप है। मानव सभ्यता की इस विकास यात्रा के समान्तर कहानी यात्रा को देखें तो भारतीय कथा-साहित्य के युग संचरण को समझा जा सकता है। दुनिया का पहला कथा केन्द्र भारत ही माना जाता है। लगातार बारह शताब्दियों तक सारी दुनिया की कहानियों का स्त्रोत यहाँ मिलता है। आदिम सभ्यता से लेकर विश्व की लगभग सारी संस्कृतियों को अपने कथाबीज यही से मिलते रहे हंै।

 

वेदों के संवादों और सूक्तों में, उपनिषदों के उपाख्यानों में, पुराण कथाओं में, रामायण और महाभारत में बोध और ज्ञान, नीति और धर्म की जो कहानियाँ मिलती है वे मनुष्य - सभ्यता के आदिम युग से लेकर संस्कृति और समृद्धि तक की यात्रा के वृतान्त है।

 

बौद्ध जातक और जैनपुरा कथाएँ, पंचतंत्र और हितोपदेश इस कथा-यात्रा के उल्लेखनीय पड़ाव है। इन कहानियों का प्रयोजन मनोरंजन से अधिक ज्ञान और आनन्द से अधिक शिक्षा रहा है। लेकिन इतनी कहानी का आधुनिक रूप इनसे भिन्न और विकसित परम्परा की देन है। इतनी समृद्ध और विविधता भरी कथा-परम्परा के बावजूद आधुनिक हिन्दी कहानी अधिकांशतः पश्चिम के सम्पर्क से ही विकसित हुई। बीसवीं शताब्दी की यात्रा सम्पन्न कर ली थी ऐसा नहीं है कि भारतीय साहित्य में इस बीच कहानी का प्रवाह रूक गया हो। सच तो यह है कि कहानी जीवन के समान्तर हमेशा जीवन्त और गतिशील रही है।

 

पिछले बीस बरसों की कथा-यात्रा में हिन्दी कहानी ने अनुभव एवं शिल्प के स्तर पर कई प्रयोग किए है। इस यात्रा में प्रत्येक छोटे-मोटे मोड़ को सूचित करने के लिए कहानी लेखकों, आलोचकों ने विविध नाम भी दिये है। नई कहानी, सचेतन कहानी, अ-कहानी वैज्ञानिक कहानी, अगली शताब्दी की कहानी जैसे कई नाम कहानी के बहुस्तरीय रूप को प्रकट करते है। वैसे दस-बीस बरस साहित्य के किसी नवीनतम दृष्टिकोण  के पनपने के लिए बहुत ज्यादा नहीं है और इसीलिए नामकरणों की जल्दबाजी में दृष्टिकोण का अर्थसंकोच होने का खतरा बराबर बना रहता है। किन्तु कई बार किसी साहित्य विधा की विशिष्टधारा को विभिन्न नामांे से संबोधित करने का मतलब उस धारा के प्रयोग-धर्मी व्यक्तित्व की सूचना में भी हो सकता है।

 

आधुनिक युग यथास्थिति से चिपके रहने का युग नहीं है। युगीन संवेदनशीलता इतनी तीव्रगति से बदलती जा रही है कि हर नई व्यवस्था के जन्म के साथ ही उसकी मृत्यु के आसार नजर आते है। इस अर्थ में किसी भाषा के साहित्य  में बहुत कम अवधि में विविध मोड़ो का निर्माण होना उस भाषा के साहित्य की जीवन्तता का लक्षण माना जाना चाहिए। हिन्दी कहानी के सम्बंध में यदि उक्त विश्लेषण सही माना जाए तो बीस बरसों की छोटी अवधि में हिन्दी कहानी की गतिशीलता, जो उसके विविध नामकरणों से सूचित हुई है, हमारे लिए अभिमानास्पद होनी चाहिए।

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कहानी के क्षेत्र में ही नहीं, समूचे साहित्य के क्षेत्र में जो एक जबरदस्त प्रवाह फूट पड़ा था, अपने आप में पूर्ववर्तियों  की अपेक्षा बिल्कुल ही नया था। यह नयापन मात्र पाश्चात्य साहित्य के अनुकरण का फल नहीं था और न रचनात्मक स्तर पर बौद्धिक बाजीगरी का, किन्तु यह नयापन या समूचे भाव बोध का जो तत्कालीन जीवन बोध का परिणाम था। परम्परागत जीवन मूल्यों के विरोध में नयी जीवन का एक ऐसा आक्रमण था, जहाँ हर पुरानी चीज अस्वीकृत की जाती है। इसलिए उस विशिष्ट संस्कृति- युग में ंपैदा हुए कहानी साहित्य को नई कहानी से संबंोधित करना कई दृष्टियों से युक्त लगता है।
सन् 1960 के बाद कथा रचना की ऐसी एक नचनात्मक चेतना सामने आई है जो पूर्ववर्ती रचना पीढ़ी से कई अर्थो में भिन्न है।

 

हिन्दी कहानी के विकास की परम्परा को छः भागों में विभक्त किया जा सकता है -

1. प्रथम उत्थान काल (सन् 1900 से 1910 तक)

2. द्वितीय उत्थान काल (सन् 1911 से 1919 तक)

3. तृृतीय उत्थान काल (सन् 1920 से 1935 तक)

4. चतुर्थ उत्थान काल (सन् 1936 से 1949 तक)

5. पंचम उत्थान काल (सन् 1950 से 1960 तक)

6. षष्ठ उत्थान काल (सन् 1961 से अब तक)

 

1. प्रथम उत्थान काल (सन् 1900 से 1910 तक)- हिन्दी कहानी का आरम्भिक काल है। किशोरीलाल गोस्वामी की इन्दुमती हिन्दी की सर्पप्रथम कहानी मानी जाती है।

 

2. द्वितीय उत्थान काल (सन् 1911 से 1919 तक) - इस काल में महाकथाकार जयशंकर प्रसाद का आगमन हुआ। श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी’ की कहानी उसने कहा था। इस काल की एक ऐसी यथार्थवादी कहानी है जो हिन्दी की दृष्टि से सर्वप्रथम कहानी मानी जाती है।

3. तृृतीय उत्थान काल (सन् 1920 से 1935 तक) - इस काल में ही कहानीकार सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र का आगमन हुआ। मुंशी प्रेमचन्द्रजी ने अपनी कहानियों में भारतीय राजनीति, अर्थ व्यवस्था, धर्म, साहित्य, दर्शन इतिहास और परिवार वर्ग का जो चित्र उतारा वह न तो किसी काल में और न किसी कहानीकार के द्वारा संभव हो सका।

 

4. चतुर्थ उत्थान काल (सन् 1936 से 1949 तक) - इस काल की कहानियों ने विभिन्न प्रकार की विचारधाराओं में प्रवेश किया। इस काल में मनोवैज्ञानिक और प्रगतिवादी विचार श्रृंखला प्रधान रूप से आई मनोवैज्ञानिक कथाकारों में इलाचन्द्र जोशी, अज्ञेय, जैनेन्द्रकुमार, चन्द्रगुप्त, विद्यालेकार और पाण्डेय बेचन शर्मा उम्र’ के नाम अधिक उल्लेखनीय है।

 

5. पंचम उत्थान काल (सन् 1950 से 1960 तक) - इस काल की कहानियाँ पूर्वापेक्षा अधिक चर्चा का विषय बन गई। इस काल की कहानियाँ पूरी तरह से कहानी’ और नई कहानी’ आदि के नाम से जानी गयी। इस समय की कहानियों में वर्तमान युगबोध, सामाजिक चरित्रता, वैयक्तिकता, अहमन्यता की अभिव्यंजना ही मुख्य रूप से सामने आयी। इस युग के कमलेश्वर, फणीश्वरनाथ रेणु, अमरकान्त, निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, राजेन्द्र अवस्थी आदि उल्लेखनीय कहानीकार है।

 

1.समकालीन हिन्दी कहानी का नया रचनात्मक मोड़ षष्ठ उत्थान काल (सन् 1961 से अब तक) - इस काल को साठोत्तरी हिन्दी कहानी काल के नाम से जाना जाता है। इस युग के कहानीकारों की पूर्वापेक्षीनयी चेतना और नये शिल्प के साथ रचना प्रक्रिया में जुट गयी है। इस कहानी की यात्रा विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों जैसे नयी कहानी (कमलेश्वर अमरकांत, मार्कण्डेय, रेणु, राजेन्द्र यादव, मन्नू भण्डारी, मोहन राकेश, शिवप्रसाद सिंह, निर्मल वर्मा, उषा, प्रियंवदा आदि) अकहानी (रमेश बख्शी, गंगाप्रसाद, विमल, जगदीश चतुर्वेदी, प्रयाग शुक्ल, दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन आदि)सचेतन कहानी (महीपसिंह, योगेश गुप्त, मनहर चैहान, वेदराही, रामकुमार भ्रमर आदि) समान्तर कहानी (कामतानाथ, से.रा.यात्री, राम अरोड़ा, जितेन्द्र भाठिया, मधुकरसिंह, इब्राहिम शरीफ, दिनेश पालीवाल, हिमांशु जोशी आदि।) सक्रिय कहानी (रमेश बत्ता, चित्रा मुद्रल, राकेश वत्स, धीरेन्द्र अस्थाना आदि) इनके अतिरिक्त ऐसे भी कथाकार है जो आन्दोलनों से अलग कथा प्रक्रिया में समर्पित है, जैसे रामदरश मिश्र, विवेक राम, मृणाल पाण्डेय, मृदुला गर्ग, निरूपमा सेवती, शैलेश मटियानी ज्ञानप्रकाश विवेक, बलराम, सूर्यबाला, मेहरूनिसा परवेज, मंगलेश डबराल आदि प्रमुख है। आज की कहानी शहरी सभ्यता, स्त्री-पुरूष सम्बंधों की नई अवधारणा त्रासदी औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप संबंधों के बिखराव, यौन कुण्ठा घिनौनी मानसिकता, हा्रस, अन्याय, अत्याचार के विरूद्ध संघर्ष के भाव के भार को ढोती हुई दिखाई दे रही है। इससे शिल्प और भाषा दोनों ही स्तरों को तराशती हुई नये तेवर को लिए हुए आज की कहानी प्रत्यनशील दिखाई दे रही है।

 

आज की हिन्दी कहानी जिसमें पिछले दोनों दशक शामिल है, निश्चित रूप से नये युग की सृष्टि है। अतः स्वभाव से ही उसमें संक्रांतिकालीन चेतना का स्तर सबसे तीव्र है। इसके अन्तर्गत हर परम्परा की अस्वीकृति, प्रयोगशीलता, वैज्ञानिक दृष्टि और बौद्धिक जटिलता के साथ युग संत्रास को अस्तित्व के रूप में झेलने की क्षमता भी है। स्पष्ट है, नई कहानी आधुनिक जीवन की हा्रसोन्मुखी प्रक्रिया एवं विघटन के प्रति अपना तीव्र क्षेम प्रकट कर रही है। स्वतंत्रता के बाद परिवर्तन के जिस सत्य को तात्कालिक लेखकीय संवेदना अनुभूतियों का हिस्सा बनकर व्यक्त करना चाह रहा था, उसी संवेदना को समकालीन कहानी अधिक सफलता से प्रकट कर रही है।-करना चाहती है। वह इसलिए भी कि आज की कहानियों में घटना और पात्र की उपयोगिता वहीं तक है जहाॅं तक वह किसी मनः स्थिति या विचारगत विशेषता को उद्घाटित करने में सहायक हो। इसलिए आज कहानियों के सामाजिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक, पौराणिक आदि अथवा चरित्र प्रधान, घटना प्रधान, वातावरण प्रधान आदि अथवा प्रकृतिवादी प्रतिक्रयावादी आदि वर्गीकरण झूठे और अस्वाभाविक हो गये हैं।

 

प्रश्न यह है कि नई कहानी के प्रांरभ से लेकर आज तक कहानी की धारा आधुनिक भाव-बोध को कितनी सफलता से प्रकट कर रही है जिसे समझना इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि नई कहानी के अन्तर्गत समकालीन कहानी का चेहरा बहुत कुछ बदला हुआ-सा दिखाई देता है। इस बदलाव के स्पष्ट आसार पिछली चार बरसों की कहानियों में दिखाई दे रहे हैं। यह बदलाव महज दृष्टि का न होकर दृष्टि को पचाकर व्यक्त करने का है। साहित्य की श्रेष्ठता एवं सफलता तभी सिद्ध होती है जब लेखकीय-बोध रचना द्वारा कला के स्तर को प्राप्त कर लेता हैं जहाॅं जीवन-बोध की नवीनता अपने आप में परम्परा से हर मायने में असंगत हो, वहाँ तो जीवन-बोध का साहित्य में रूपान्तरण और भी कठिन हो जाता है। एक ओर इस प्रतिक्रया को पूर्ण होते देर भी लगती है और दूसरी ओर संक्रातिकालीन अनुभूतियों के साथ ईमानदार रहने में भयंकर यातनाओं से गुजरना पड़ता है। परिणाम यह होता है कि साहित्य निर्मित प्रक्रिया अधूरी रह जाती है, और फिर उसी धारा के अन्तर्गत रचनात्मकता का नया प्रवाह ऊपर उठने की कोशिश करता है। यह नया प्रवाह पुराने प्रवाह की प्रेरणाओं को लेकर ही आगे बढ़ता है, और गलत दिशा में जाने वाले अपने ही प्रवाह के पिछले हिस्से को सही दिशा देता है। हमें लगता है कि नई कहानी की धारा के अन्तर्गत सातवें दशक की हिन्दी कहानी इस प्रकार के रचनात्मक मोड़ को स्पष्ट करती है। चाहे हम सचेतन कहानी, अ-कहानी या कोई और कहानी कहकर पुकार ले, इन नामों की विशिष्टता नई कहानी की समग्र पृष्ठभूमि में ही समझी जा सकती है। साठोत्तरी हिन्दी कहानी नई कहानी का ही प्रकारान्तर है। वही उसी का नया रचनात्मक मोड़ है।

 

छठे दशक का अंतिम चरण और सातवें दशक के प्रारंभिक चरण के बीच की ऐतिहासिक एवं साहित्यिक परिस्थितियों में नई कहानी का ठहराव स्तर परिलक्षित होता है जहाँ से समकालीन कहानी नया मोड़ धारण कर लेती हैं।

 

2. समकालीन कहानी का स्वरूप-समकालीन कहानी जीवन यथार्थ से सीधे टकराती है। इस टकराव के पीछे एक ऐसी पूर्वाग्रह रहित दृष्टि है जो किसी भी परम्परागत मूल्य-परिपाटी को नकारती हुई अस्तित्व-बोध की गहरी जटिलता को अभिव्यक्त करती है।

 

माक्र्सीय, मनोवैाानिक, समाजशास्त्रीय और मूल्य परक दृष्टियाॅं अब आरोपित न रहकर उसकी मानसिकता का अंग बन चुकी हैं। पिछली कहानियाॅं किताबी एवं आरोपित बोध का शिकार बनकर व्यवस्था के संबंध में एक समझदार चुप्पी अख्तियार कर लेती रही है। लेकिन समकालीन कथा ने व्यवस्था के प्रति जो प्रचण्ड आक्रोश व्यक्त किया है उसका स्तर बेहद तल्ख एवं बेलाग होता हुआ, आधुनिक मनुष्य के संबंध में एक व्यंग्य और करूणा का एहसास कराता है।

 

समकालीन कहानी के इस परिपाश्र्व में सचेतन कहानी और अकहानी जैसे नाम उभर रहे हैं। सचेतन कहानी को आन्दोलन का रूप देने वाले डा. महीपसिंह की घोषणा के अनुसार सचेतना एक दृष्टि है, जिसमें जीवन जिया भी जाता है और जाना भी जाता है। सचेतन दृष्टि जीवन से नहीं, जीवन की ओर भागती है।

 

सचेतन कहानी ने फिर से मनुष्य के टोटल सेल्फ को स्थापित करने का प्रयत्न किया और जीवन को स्वीकारने का स्वर बुलंद किया।

 

सचेतन कहानी मनुष्य और जीवन के तनाव का चित्रण नहीं, बल्कि उसके संघर्ष को भी समर्पित है। इसमें निराशा, अनास्था और बौद्धिक तटस्थता का प्रत्याख्यान किया जाता है और मृत्युभय, व्यर्थता, एवं आत्म-परभूत चेतना का परिहार भी इस दृष्टि से आत्म-सजगता है, तथा संघर्ष की इच्छा भी सचेतन कहानीकार भविष्यहीन नहीं है। वस्तुतः समकालीन कहानी साहित्य इन्हीं विशेषताओं को लेकर विकसित हो रहा है। इसे स्वतंत्र आन्दोलन न कहकर यदि नई कहानी में अन्व्र्याप्त अकहानीत्व का विरोध करने वाली समकालीन धारा कहा जाय तो अधिक उचित होगा।

 

3. समकालीन कहानी की सम्भावनाए-कथ्य के संबंध में समकालीन कहानी परम्परा-मुक्त होने के सफल प्रयास कर रही है। आज का कहानीकार किसी भी कथ्य पर अवलम्बित नहीं रहा है। सतही और सामान्य कथ्यात्मकता से आज की कहानी मुक्त हो रही है।

 

इन कहानियों में जो दुनिया उभर रही है, उसमें रहने वाला व्यक्ति किसी भी व्यवस्था का गुलाम नहीं है। वह यथास्थिति को भी स्वीकार नहीं करता, पर सक्रिय जरूर है, इसलिए इस दुनिया का व्यक्ति भविष्यवादी न होकर भी आने वाले भविष्य की खोज कर रहा है। इसे कमलेश्वर ने आगतवादी कहा है। इस दुनिया का व्यक्ति भविष्य के किसी सपने को संजोना नहीं चाहता, क्योंकि वह पूर्णतः सपनों से मुक्त है। इसीलिए किसी भी नारे और घोषणा बाजी में उसका विश्वास नहीं है। इस दुनिया का व्यक्ति अपने लिए अपनी दुनिया चाहता है, एक ऐसी दुनिया जो वर्तमान की विसंगतियों से निकलना चाहती है और आने वाले कल के प्रति सचेत है। इस दुनिया का व्यक्ति अपनेपन की पहचान की तलाश में अग्रसर रहा है। इसका कोई पिछला कल नहीं न अलगा स्पप्न-प्रेरित कल वह उधर जा रहा है जिधर सही जमीन की संभावनाए है। इस मार्ग पर भी वह झूठ को छाॅंटते जा रहा है। उसकी विकास यात्रा जैनुइन की तलाश की यात्रा हैं।


Tuesday

सूचना का अधिकार

                  सूचना का अधिकार 

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आमलोगों को सूचना का अधिकार प्रदान करने से तात्पर्य होता है, जनभागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया सराहनीय कदम, क्योंकि किसी भी संवैधानिक सत्ता से समुचित सूचना पाने का जो अधिकार पहले सिर्फ जनप्रतिनिधियों के पास होता है, वही कमोबेश इस कानून के माध्यम से जनता में भी हस्तांतरित कर दिया गया है।

यदि आम लोगों द्वारा इसका सदुपयोग किया जाए तो सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचार में काफी कमी सकती है।इससे विकास और सुशासन की अवधारणा परिपुष्ट होती है। लेकिन यदि इसका किसी भी प्रकार से दुरुपयोग किया जाए अथवा दुश्मन देशों से एकत्रित आँकड़े और जानकारियां सांझा की जाने लगे तो किसी भी शासन द्वारा स्थापित व्यस्था की स्वाभाविक गति भी अवरुद्ध हो सकती है। शायद यही वजह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, एकता अखंडता जैसे कतिपय अहम पहलुओं के मद्देनजर कुछ सूचनाओं को मांगने का जनता का अधिकार ही इस कानून में कानूनन प्रतिबंधित कर दिया गया है।


वर्ष 2005 में भारत में अस्तित्व में आया सूचना का अधिकार कानून-:

15 जून 2005 को भारत में सूचना का अधिकार कानून को अधिनियमित किया गया और 12 अक्टूबर 2005 को सम्पूर्ण धाराओं के साथ लागू कर दिया गया। सूचना का अधिकार को अंग्रेजी में राइट टू इनफार्मेशन कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है, सूचना पाने का अधिकार। जो सूचना का अधिकार कानून लागू करने वाला राष्ट्र अपने नागरिकों को अधिकार प्रदान करता है। सूचना के अधिकार के द्वारा राष्ट्र अपने नागरिकों को अपनी कार्य प्रणाली और शासन प्रणाली को सार्वजनिक करता है।

किसी भी लोकतांत्रिक देश में देश की जनता अपने चुने हुए व्यक्ति को शासन करने का अवसर प्रदान करती है, और उनसे यह अपेक्षा करती है कि सरकार पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ अपने सभी दायित्वों का पालन करेगी। लेकिन बदलती परिस्थितियों में अधिकांश राष्ट्रों ने अपने दायित्वो का गला घोंटते हुए पारदर्शिता और ईमानदारी की बोटियां नोंचने में कोई कसर नही छोड़ी , लगे हाथ भ्रष्टाचार के बड़े -बड़े कीर्तिमान कायम करने के लिए एक भी मौका अपने हाथ से गवांना नही भूले, तब जाकर सूचना का अधिकार कानून की अहमियत समझी गई और इसे लागू करने के लिए एक सार्थक मुहिम चलाई गई।

दरअसल भ्रष्टाचार के विभिन्न कीर्तिमानों को स्थापित करने के लिए सत्ताधारी पार्टी द्वारा हर वो काम किया जाता है, जो जनविरोधी और अलोकतांत्रिक है।क्योंकि तब सरकारें यह भूल जाती हैं कि जनता ने उन्हें चुना है।जो देश की असली मालिक है, और सरकार उनकी द्वारा चुनी हुई नौकर। इसलिए मालिक होने के नाते जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि जो सरकार उनकी सेवा में है, वह क्या कर रही है? आमतौर पर प्रत्येक नागरिक सरकार को किसी किसी माध्यम से कर देती है। यह कर देश के विकास और व्यस्था की आधारशिला को निरंतर स्थिर रखता है, इसलिए जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उसके द्वारा दिया गया पैसा कब,कहाँ और किस प्रकार खर्च किया जा रहा है? इसके लिए यह जरूरी है कि सूचना को जनता के समक्ष रखने एवं उसको यह प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया जाए, जो कि एक कानून के द्वारा ही संभव है।



सूचना का अधिकार (संशोधन) विधयेक,2019

हाल ही में लोकसभा ने सूचना का अधिकार संशोधन विधयेक 2019 पारित किया।इसमें सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को संशोधित करने का प्रस्ताव किया गया है।

संशोधन के प्रमुख बिंदु-:

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त(चीफ इनफार्मेशन कमिश्नर) और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है, परंतु संशोधन के तहत अब इसे केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जाएगा।

नए विधेयक के तहत केंद्र और राज्य स्तर पर मुख्य सूचना आयुक्त एवं इनके वेतन भत्ते तथा अन्य रोजगार की शर्तें भी केंद्र सरकार द्वारा ही तय की जाएगी।

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 यह प्रावधान करता है कि यदि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त पद पर नियुक्त होते समय उम्मीदवार किसी अन्य सरकारी नौकरी की पेंशन या अन्य सेवानिवृत्त लाभ प्राप्त करता है तो उस लाभ के बराबर राशि को उसके वेतन से हटा दिया जाएगा, लेकिन इसमें संशोधन विधेयक में इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है।

प्रमुख प्रावधान-:

इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत भारत का कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी प्राधिकरण से सूचना प्राप्त करने हेतु अनुरोध कर सकता है, यह सूचना 30 दिनों के अंदर उपलब्ध कराई जाने की व्यवस्था की गईं है ।यदि माँगी गई सूचना जीवन और व्यक्तिगत स्वन्त्रता से संबंधित है तो ऐसी सूचना को 48 घण्टे के भीतर ही उपलब्ध कराने का प्रावधान है।

इस अधिनियम में यह भी कहा गया है कि सभी सार्वजनिक प्राधिकरण अपने दस्तावेजो का संरक्षण करते हुए उन्हें कंप्यूटर में सुरक्षित रखेंगे।

प्राप्त सूचना की विषय वस्तु के संदर्भ में असंतुष्टि निर्धारित अवधि में सूचना प्राप्त ना होने आदि जैसी स्थिति में स्थानीय से लेकर राज्य और केंद्रीय सूचना आयोग में अपील की जा सकती है।

इस अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री संसद राज्य विधानमंडल के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक निकायों उनसे संबंधित पदों को भी सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में लाया गया है

इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्र स्तर पर एक मुख्य सूचना आयुक्त और 10 या 10 से कम सूचना आयुक्ततो की सदस्यता वाले एक केंद्रीय सूचना आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है।इसी के आधार पर राज्य में भी एक राज्य सूचना आयोग का गठन किया जाएगा।

यह अधिनियम जम्मू और कश्मीर को छोड़ कर अन्य सभी राज्यों पर लागू होता है।

इसके अंतर्गत सभी संवैधानिक निकाय संसद अथवा राज्य विधानसभा के अधिनियमो द्वारा गठित  संस्थान और निकाय शामिल हैं।

ऐसे कौन से मामलें हैं जिनमेँ सूचना देने से इनकार किया जा सकता है?

राष्ट्र की सम्प्रभुता, एकता अखंडता सामरिक हितों आदि पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली सूचनाएं प्रकट करने की बाध्यता से मुक्ति प्रदान की गई है।

सूचना के अधिकार के समक्ष चुनौतियाँ

 सूचना के अधिकार अधिनियम के अस्तित्व में आने से सबसे बड़ा खतरा आरटीआई कार्यकर्ताओं को है, इन्हें कई तरीके से उत्पीड़ित किया जाता है।औपनिवेशिक हितों के अनुरूप निर्मित वर्ष 1923 का सरकारी गोपनीयता अधिनियम आरटीआई की राह में प्रमुख बाधा है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने इस अधिनियम को खत्म करने की सिफारिश की है, जिस पर पारदर्शिता के लिहाज से अमल करना आवश्यक है। इसके अलावा कुछ अन्य चुनौतियाँ भी विद्यमान है जैसे-नौकरशाही में अभिलेखों के रखने उनके संरक्षण की व्यस्था बहुत कमजोर है। सूचना आयोग को चलाने के लिए प्राप्त अवसंरचना और कर्मचारियों का अभाव है सूचना का अधिकार कानून के पूरक कानूनों जैसे -व्हिसल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम का कुशल क्रियान्वयन नहीं हो पाया है।

 केंद्रीय सूचना आयोग की संरचना

सूचना का अधिकार,2005 के अध्याय-3 में केंद्रीय सूचना आयोग तथा अध्याय-4 में राज्य सूचना आयोगों के गठन का प्रावधान है। इस कानून की धारा-12 में केंद्रीय सूचना आयोग के गठन ,धारा-13 में सूचना आयुक्तों की पदावधि एवं सेवा शर्ते धारा-14 में उन्हें पद से हटाने संबंधित प्रावधान किए गए हैं।केंद्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम 10 केंद्रीय सूचना आयुक्त का प्रावधान है, और इनकी नियुक्ति रास्ट्रपति द्वारा की जाती है।ये नियुक्तियां प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बनी समिति की अनुशन्सा पर की जाती है, जिसमे लोकसभा में विपक्ष का नेता और प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत मंत्री सदस्य होते हैं।

DOPT है इसका नोडल मंत्रालय

-कार्मिक और प्रशिक्षण् विभाग सूचना का अधिकार और केंद्रीय सूचना आयोग का नोडल विभाग है, अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों और प्राधिकरणों को आरटीआई अधिनियम के अंतर्गत लाया गया है।आधुनिक तकनीक के उपयोग से आरटीआई दाखिल करने के लिए अब एक बोटल और एप्पलीकेशन भी उपलब्ध है, जिसकी सहायता से कोई भी नागरिक अपने मोबाइल फ़ोन से किसी भी समय किसी भी स्थान से आरटीआई के लिए आवेदन कर सकता है। केंद्र सरकार के 2200 सरकारी कार्यालयो और उपक्रमों में ऑनलाइन आरटीआई दाखिल करने और उसका जवाब देने की व्यवस्था है। ऐसा आम संस्थानों के कामकाज में अधिकतम पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्धता को ध्यान में रखते हुए किया गया है।राज्य सरकारों को भी आरटीआई पोर्टल शुरू करने की व्यावहारिकता पर विचार करने को कहा गया है।राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र ऑनलाइन आरटीआई पोर्टल बनाने मे राज्य सरकारो की सहायता करने को कहा गया है।



संज्ञा

संज्ञा की परिभाषा संज्ञा उस विकारी शब्द को कहते है , जिससे किसी विशेष वस्तु , भाव और जीव के नाम का बोध हो , उसे संज्ञा कहते है। दूसरे शब्दो...